मई दिवस की पूर्व संध्या पर बच्चों ने देखी फ़िल्म ग्लास

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रामनगर

मई दिवस की पूर्व संध्या पर बच्चों ने देखी फ़िल्म ग्लास…रचनात्मक शिक्षक मण्डल की पहल पर से 200 से अधिक स्कूली बच्चों ने मई दिवस की पूर्व संध्या पर जश्न के बचपन व्हाट्सएप्प ग्रुप व सोशल मीडिया के अन्य माध्यम से मानवीय श्रम के महत्व को रेखांकित करती फ़िल्म ग्लास को देखा। शिक्षक मण्डल के संयोजक नवेंदु मठपाल के अनुसार ग्लास फ़िल्म निर्देशक और निर्माता बर्ट हैन्स्ट्रा की 1958 की डच लघु वृत्तचित्र फिल्म है। इस फिल्म ने 1959 में डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट के लिए ऑस्कर जीता। यह फिल्म नीदरलैंड में कांच उद्योग के बारे में है।फ़िल्म हाथ से विभिन्न कांच के सामान बनाने वाले कारीगरों के मानवीय श्रम को बताती है। बच्चों को फ़िल्म दिखाने के साथ साथ दिल्ली से सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े सिनेमा समीक्षक संजय जोशी विस्तार से बच्चों को उसकी भाषा,संगीत के बारे में बताते भी चलते हैं।जोशी के अनुसार फ़िल्म की सबसे महत्वपूर्ण घटना है फ़िल्म में जैसे ही कांच मानवीय श्रम के बजाय मशीन से बनता है फ़िल्म का संगीत भी उसी अनुसार तेजी बदल जाता है।फिल्मकार अंत में फिर से मानवीय तरीके से कांच बनाना दिखा मानवीय श्रम के महत्व को रेखांकित करता है। जाने माने फिल्मकार बर्ट हैनस्ट्रा को मशीन का मालिक अपने कांच उद्योग के प्रचार के लिए फ़िल्म बनाने के लिए लेकर जाता है पर वहां वे कांच उद्योग के मानवीय श्रम पर केन्द्रित कर फ़िल्म का निर्माण कर डालते हैं।फ़िल्म के मध्य में जबकि मशीनी श्रम, मानवीय श्रम पर हावी होता दिखता है अचानक मशीनी कमी से एक बोतल के टूटने की घटना फिर से मानव के उसके श्रम से रिश्ते को सामने ले आती है और पूरे फ़िल्म का परिदृश्य ही बदल जाता है।उन्होंने कहा कि वर्तमान में मशीनें जिस प्रकार हमको रोबोट में तब्दील करती जा रही हैं यह प्रक्रिया खतरनाक है ऐसे में मनुष्य बने रहना और उसपर भी श्रम के मानवीय पहलू के सम्मान को बरकरार रखना अति महत्वपूर्ण है।

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