दीवान कनवाल ने अलविदा कहा, कुमाऊंनी गीतों की दुनिया में हुआ खालीपन

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उत्तराखंड के मशहूर लोक गायक दीवान कनवाल बुधवार की सुबह अपने खत्याड़ी स्थित आवास पर अंतिम सांस ले गए। उनका अंतिम संस्कार बेतालेश्वर घाट पर किया जाएगा। अल्मोड़ा जिले के रहने वाले दीवान कनवाल के निधन की खबर से लोक कलाकारों और संगीत प्रेमियों में गहरा शोक छा गया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दीवान कनवाल के निधन पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और संगीत को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मुख्यमंत्री ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए शोक संतप्त परिवार और उनके प्रशंसकों को दुःख सहने की शक्ति देने की कामना की।

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राज्यपाल गुरमीत सिंह ने भी अपने शोक संदेश में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त की। अल्मोड़ा के पूर्व विधायक रघुनाथ सिंह चौहान ने भी लोक गायक को श्रद्धांजलि दी।

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दीवान कनवाल की लोकप्रिय रचनाओं में ‘द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनी में’ और शेर दा अनपढ़ पर आधारित गीत शामिल हैं, जिन्हें आज भी कुमाऊंनी संस्कृति के प्रेमी बड़े चाव से सुनते हैं।

लगभग 65 वर्ष की आयु में निधन के समय, दीवान कनवाल पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में इलाज के बाद वे अपने आवास पर स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे।

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दीवान कनवाल के दो बेटे और दो बेटियां हैं। उनके बड़े बेटे अल्मोड़ा में और छोटे बेटे मुंबई में कार्यरत हैं। उनकी पत्नी का निधन पहले ही हो चुका था। रिटायरमेंट के बाद दीवान कनवाल ने पूरी तरह लोक संगीत और गीत रचनाओं को समर्पित कर दिया था। लोक समुदाय और उनके श्रोताओं ने उनके योगदान को कुमाऊंनी संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

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