उत्तराखंड में वर्ष 2026 की चारधाम यात्रा को लेकर सरकार ने अभी से तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी क्रम में बदरीनाथ धाम में धार्मिक मर्यादा बनाए रखने के लिए बड़ा निर्णय लिया गया है। अब सिंहद्वार से आगे श्रद्धालुओं को मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं होगी। इस संबंध में गढ़वाल आयुक्त ने आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।
चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं को लेकर ऋषिकेश स्थित ट्रांजिट कैंप में एक समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में गढ़वाल आयुक्त ने चमोली जिला प्रशासन को निर्देश दिए कि श्रद्धालुओं के मोबाइल फोन जमा कराने के लिए सुव्यवस्थित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में धार्मिक स्थलों पर रील और ब्लॉग बनाने के दौरान विवाद की घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें रोकना आवश्यक है। बैठक में गढ़वाल आयुक्त विनय शंकर पांडे, आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप सहित पौड़ी, टिहरी, चमोली, हरिद्वार, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक मौजूद रहे।
इस बीच शीतकालीन यात्रा के दौरान चारधामों के प्रवास स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। अब तक 27 हजार से अधिक श्रद्धालु शीतकालीन प्रवास स्थलों में दर्शन कर चुके हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या बाबा केदार के शीतकालीन प्रवास स्थल ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में देखने को मिली है, जहां करीब 17 हजार श्रद्धालुओं ने दर्शन किए हैं।
पर्यटन विभाग के अनुसार शीतकालीन प्रवास स्थलों पर प्रतिदिन औसतन 500 से अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। चारधामों के कपाट बंद होने के बाद बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम की पूजा शीतकालीन प्रवास स्थलों पर संपन्न कराई जाती है।
बदरीनाथ धाम की शीतकालीन पूजा पांडुकेश्वर और जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर में होती है, जहां अब तक 6400 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। यमुनोत्री धाम की शीतकालीन पूजा खरसाली में संपन्न होती है, जहां 1017 श्रद्धालु मां यमुना के दर्शन कर चुके हैं। वहीं गंगोत्री धाम के शीतकालीन प्रवास स्थल मुखवा में अब तक 3300 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं।
प्रदेश में सालभर पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य सरकार शीतकालीन यात्रा को लगातार प्रोत्साहित कर रही है। पर्यटन विभाग की ओर से शीतकालीन यात्रा का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, ताकि जो श्रद्धालु चारधाम यात्रा के दौरान धामों तक नहीं पहुंच पाते, वे शीतकालीन प्रवास स्थलों पर पहुंचकर पूजा-अर्चना और दर्शन कर सकें।




