होली स्पेशल-रंगों जितना ही वैविध्यपूर्ण है जीवन भी।।

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होली स्पेशल

रंगों जितना ही वैविध्यपूर्ण है जीवन भी

भारत एक ऐसा उत्सवधर्मी देश है , जहाँ हर तीसरे महीने एक बड़े उत्सव की अगवानी को हम सब आतुर रहते हैं| पिछली होली चूँकि कोरोना के साये में सहमी-सहमी गुजरी|मन मारकर उसके नैसर्गिक उल्लास से वंचित रहना ही श्रेयस्कर भी था| इस साल की होली में पिछला कोटा भी पूरा करना है|
एक तरफ ऋतुराज के आगमन से चारो ओर का परिवेश पहले ही से मादक था,ऊपर से होली की दस्तक ने माहौल को और रागी बना दिया| प्रेम-प्रीत का ऐसा घोल तैयार हुआ कि बस पूछो मत|नये-पुराने यारों, संग-साथियों के साथ होली के दिन की तमाम दास्तानें स्वत: ताजी हो गयीं|


ब्रज की होली के अमर गायक कवि
नज़ीर अकबराबादी की होली का दृश्य विधान का तो कहना ही क्या…
मची है रंग की कैसी बहार होली में,
अजब है हिंद की बहार देखो होली में |
जिस कबीर को आलेचक बागी कहते थकते नहीं, उत्तर भारत में होल्यारों की मंडली उन्हीं कबीर के नाम से कबीरा सारारारा…गाकर
रंगपर्व को और रससिक्त बनाती है|
जन्मत:प्रेमी मन लेकर पैदा हुए मलिक मोहम्मद
जायसी , जिनकी नायिका का तन-मन दोनों होलिका की आग की तरह दहक रहा है, उसका क्या करें….
होई फाग गलि चाँचर जोरी,
बिरह जराई दीन्ह जस होरी |

रीतिकालीन कवि पद्माकर का जिक्र किये बगैर होली पूरी कैसे होगी| जिसमें गोपियाँ कान्हा को बरबस पकड़कर बारी-बारी ऐसा रंग मलती हैं मानों, वर्षों की साध पल भर में पूरी करने की होड़ लगी हो…पहले मैं रंग लगाऊँगी तो पहले मैं…

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फागु की भीरि अभीरिन में
गहि गोबिन्द लै गयो भीतर गोरी……नैन नचाई कही मुसुकाई
लला फिरि आइओ खेलन होरी||

यमुना का किनारा और कदंब के पेड़ों के इर्दगिर्द
ग्वाल-बालाएं एक दूसरे की बाह पकड़कर अपनी अपनी ओर खींचते हुए गुलाल लगाने की होड़ की लालसा ही तो जीवनराग है|
इसी बहाने गाल छूने की अवसर भला कौन मूरख जाने देगा | गोकुल में रंग खेलने के बाद जब गोपियाँ बरसाने पहुँचती हैं तो सारी रसभरी बातें राधा को बताती हैं| राधा नागर हैं वे सहेलियों की नशीली आँख देखते ही भाप लेती हैं….
होली में गयी तो भई बावरी सखी री आज
छलिया छबीले ने चलाई
कछु चाल है
आली देख देख आँख में
गुलाल है कि लाल है|

यह त्यौहार जिस नेह की माँग करता है उसे महसूस कीजिये| रंग से जो सराबोर नहीं इसका मतलब ही यही हुआ कि उस आदमी में कुछ तो खोट है जिससे उसे इस लायक होल्यार मान ही नहीं रहे |
रंगों के अपने प्रतीकात्मक अर्थ, गुण और भाव के अनुसार ही उसका अनुपम वैभव है|परंतु होली में कोई एक रंग की सत्ता नहीं होती अपितु सब मिलकर विविधवर्णी हो जाता है| यही समाहार कुछ संकेत करती है कि अलग अलग छिटको मत| पास आओ, साथ आओ| जीवन का असली आनंद तो सामूहिकता में छिपा है|

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बहरहाल,इस होली कोरोना से बेरंग हुई जिंदगी को धैर्य और बुद्धिमत्ता के रंग से अनूठी बनाने का अवसर आप हाथ से न जाने देना|
मैं -मैं के दंभ को होलिका में जलाना आपको ही है| तभी अपनों की प्रीत का रंग चढ़ेगा|
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संतोषकुमार तिवारी
राजकीय इंटर कॉलेज ढिकुली, नैनीताल में हिंदी के प्रवक्ता हैं| दो काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| पीरूमदारा में रहते हैं|
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