स्वर्ग का एहसास कराती हैं उत्तराखंड की वादियां: उर्वशी दत्त बाली
काशीपुर। डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर और समाज सेविका श्रीमती उर्वशी दत्त बाली आजकल उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा पर है। प्रकृति के विहंगम दृश्यों को देखकर वह कहती है कि उत्तराखंड की प्राकृतिक वादियां वास्तव में स्वर्ग से कम नहीं हैं। लोग स्विट्जरलैंड लद्दाख और कश्मीर को सुंदर बताते हैं लेकिन उत्तराखंड भी इनसे पीछे नहीं है।
श्रीमती बाली कहती है कि काशीपुर से पिथौरागढ़ तक का सफर बेहद खूबसूरत है, लेकिन असली जादू शुरू होता है पिथौरागढ़ से गांव गूंजी की तरफ बढ़ते ही। इसलिए इस यात्रा में एक नाइट स्टे पिथौरागढ़ में जरूर करें, ताकि अगले दिन पहाड़ों की असली खूबसूरती को आराम से महसूस किया जा सके।पिथौरागढ़ से गूंजी तक जाते हुए हर मोड़ पर बदलते नज़ारे ऐसा एहसास कराते हैं जैसे कभी आप लद्दाख की सीधी काली सड़कों पर हों तो कभी कश्मीर की वादियों में, हरे पहाड़ बहती नदियां और कभी स्विट्जरलैंड की बर्फीली घाटियों में, यहां पिघलती बर्फ नदियों का रूप लेती नजर आती है,, पहाड़ों के बीच से गुजरती लंबी सड़कें, रास्ते में गिरते बड़े-बड़े झरने, बादलों से ढकी चोटियाँ और दूर तक फैली हरियाली मन को बार-बार गाड़ी रुकवाने पर मजबूर कर देती है, साथ ही हल्की ठंडक में हर घंटे बाद चाय का मजा भी अलग ही आनंद देता है।
एक रात पिथौरागढ़ रुकने के बाद अगला पड़ाव था खूबसूरत गूंजी गांव — एक ऐसी जगह जहाँ पहुँचकर लगता है कि धरती पर स्वर्ग है तो वह यहीं बसता है। गूंजी में कम से कम दो दिन जरूर रुकना चाहिए। एक तरफ ओम पर्वत के दर्शन और दूसरी तरफ आदि कैलाश की अद्भुत झलक सच में देवों के देव महादेव भोले के नजदीक होने का एहसास कराती है, मंदिर की घंटियां, भोले के नाम की गूंज, श्रद्धा से भरे हुए भगत… हर दृश्य मन को भीतर तक शांति देता है।
6 से 8 डिग्री तापमान, शाम की हल्की बारिश और रात भर में बर्फ से ढकते पर्वत… सुबह जब नींद खुलती है तो वही पहाड़, जो पिछली शाम तीन रंगों में दिखाई दे रहे थे, अब सफेद चादर ओढ़े खड़े मिलते हैं। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने रातों-रात कोई जादू कर दिया हो।
काले रंग की सड़कें जब चारों तरफ जमी सफेद बर्फ के बीच से गुजरती हैं तो दृश्य बिल्कुल किसी विदेशी फिल्म जैसा लगता है। बच्चों और युवाओं के लिए यह सफर किसी सपने से कम नहीं — कहीं झरनों के बीच मस्ती, कहीं बर्फ में खेलना और कहीं हर पल कैमरे में कैद करने की चाह।इस यात्रा में अपने साथ छाता, पानी गर्म करने के लिए इलेक्ट्रिक की छोटी केतली तो जरूर लें कर जाए, एक जैकेट, गरम जुराब,घर के बने नाश्ते, अचार और मठरी, बेशन के लड्डू तो जरूर ही लेकर जाएँ। ओर वहाँ के होमस्टे भी बेहद प्यारे हैं और गांव वालों का अपनापन भी इस सफर को और खास बना देता है। गाँव के खाने का अपना अलग आनंद है, लेकिन पहाड़ों में अपने घर का अचार साथ हो तो सफर और यादगार लगने लगता है।
गांव वालों की सादगी दिल छू लेने वाली है। सुबह पुराने अंदाज़ में हाथ में केतली लेकर गर्म चाय देने आना, फिर बार-बार मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खटखटाकर खाना खाने के लिए बुलाना… उनकी बातों में अपनापन और चेहरे पर सच्ची मुस्कान साफ दिखाई देती है। बिना किसी दिखावे के, पूरे दिल से मेहमाननवाज़ी करना शायद पहाड़ों से ही सीखा जा सकता है। ऐसा अपनापन अब शहरों में बहुत कम देखने को मिलता है।
पूरे सफर के दौरान बस एक ही एहसास बार-बार मन में आता रहा कि भोले ने इतने साल पहले क्यों नहीं बुलाया…”
वापस लौटते समय मन बिल्कुल नहीं करता कि इस जगह को छोड़कर जाएँ। ऐसा लगता है जैसे हर महीने फिर वहीं लौट जाएँ… उन्हीं पहाड़ों के बीच, उन्हीं बादलों के पास और अपने भोलेनाथ के श्री चरणों में। 🔱




