सीलिंग भूमि के अवैध विक्रय में प्रशासन की चूक, हाईकोर्ट के दोषियों की पहचान के निर्देश

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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सीलिंग की गई भूमि के धोखाधड़ी से बेचे जाने के मामले को गंभीरता से लिया है। न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जब यह भूमि पहले ही ‘सरप्लस’ घोषित की जा चुकी थी, तो राजस्व अभिलेखों में इसका अंकन क्यों नहीं किया गया।

न्यायालय ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए जिलाधिकारी उधम सिंह नगर को आदेश दिए हैं कि वे उन अधिकारियों के खिलाफ विस्तृत जांच करें, जिनकी वजह से प्रतिबंधित भूमि की अवैध बिक्री संभव हो सकी। मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल, 2026 को निर्धारित की गई है।

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मामला काशीपुर के खसरा नंबर 13 मीन की 0.418 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता लक्ष्मी देवी के अनुसार, बीना व जसवंत सिंह ने इस भूमि का विक्रय विलेख (सेल डीड) उनके पक्ष में निष्पादित किया। जबकि यह भूमि ‘उत्तर प्रदेश अधिरोपण और भूमि जोत सीमा (संशोधन) अधिनियम, 1972’ के तहत पहले ही सरप्लस घोषित की जा चुकी थी। कोर्ट को यह भी बताया गया कि उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) काशीपुर ने बीना को नोटिस जारी कर अवैध कब्जे की चेतावनी दी थी, लेकिन इसके बावजूद जमीन को बेचा गया।

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सुनवाई के दौरान आरोपी व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित हुए। बीना ने अनभिज्ञता जताई, जबकि जसविंदर सिंह ने अपनी गलती स्वीकार की और याचिकाकर्ता लक्ष्मी को 6 लाख रुपये का चेक अदालत में सौंपा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकारी तंत्र की विफलता के बिना यह धोखाधड़ी संभव नहीं थी और दोषी अधिकारियों की पहचान कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

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हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी उधम सिंह नगर को चार सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही, अन्य प्रतिवादियों को भी अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया गया है।

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