मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (UTU), देहरादून में आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराजः’ कार्यक्रम में प्रतिभाग करते हुए हिमालय संरक्षण और सतत विकास को लेकर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने हिमालय परिषद् में बुनियादी ढांचे और संसाधनों के विस्तार के लिए ₹1 करोड़ की वित्तीय सहायता की घोषणा की। इसके साथ ही, हिमालयी क्षेत्र के संवर्धन, संरक्षण और शोध कार्य में उत्कृष्ट योगदान देने वाले वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रतिवर्ष ‘हिमालय विभूति सम्मान’ प्रदान करने का ऐलान किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़े पांच पोस्टरों तथा ‘विज्ञान संप्रेषण’ पत्रिका के पांचवें वार्षिकांक का भी विमोचन किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड के विकास का मार्ग इकोलॉजी (पारिस्थितिकी) और इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) के सटीक संतुलन से ही संभव है। उन्होंने जोर दिया कि राज्य का विकास मॉडल ऐसा होना चाहिए जहां आधुनिक बुनियादी ढांचा और रोजगार के अवसर विकसित हों, लेकिन साथ ही वन, नदियां और पहाड़ों की वहन क्षमता भी पूरी तरह सुरक्षित रहें। जलवायु परिवर्तन को एक गंभीर वैश्विक संकट बताते हुए उन्होंने कहा कि पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचाने के बावजूद हिमालयी क्षेत्र इसका सबसे बड़ा प्रभाव झेल रहे हैं, जिसके समाधान के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा जवाबदेही और ‘मिशन लाइफ’ जैसी पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाना अनिवार्य है।

हिमालय संरक्षण को सरकारी आयोजनों से आगे बढ़ाकर एक जन आंदोलन बनाने का आह्वान करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश में 2 से 9 सितंबर तक ‘हिमालय दिवस सप्ताह’ मनाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिमालय का संरक्षण और पहाड़ों की समृद्धि परस्पर जुड़े हुए हैं। प्राकृतिक खेती, होमस्टे, पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देकर पलायन को नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने प्रदेश की जैव विविधता, बुग्यालों और नदियों को राज्य की वास्तविक पारिस्थितिकीय पूंजी बताया, जो आने वाले समय में उत्तराखण्ड की मजबूत आर्थिक शक्ति का आधार बनेंगी।




