सीमांत क्षेत्रों तक पहुंची सरकार, विकास को नई रफ्तार: भारत-नेपाल सीमा से सटे बनबसा में पहली बार हुई धामी कैबिनेट की बैठक

ख़बर शेयर करें -

उत्तराखण्ड में शासन और प्रशासनिक व्यवस्था को राजधानी से बाहर दूरस्थ व सीमांत क्षेत्रों तक ले जाने की दिशा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ऐतिहासिक पहल की है। इसी क्रम में भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे चम्पावत जनपद के बनबसा स्थित एनएचपीसी परिसर में पहली बार राज्य मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की बैठक आयोजित की गई। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में संपन्न हुई इस बैठक में क्षेत्रीय विकास, जनहित और आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ करने से जुड़े दर्जनों महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों पर मुहर लगाई गई। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि कैबिनेट बैठकें अब केवल देहरादून तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि विभिन्न जनपदों में भी आयोजित की जाएंगी ताकि स्थानीय समस्याओं, जन-आकांक्षाओं और विकास की संभावनाओं को सीधे शासन के समक्ष रखकर त्वरित व व्यावहारिक निर्णय लिए जा सकें।

यह भी पढ़ें 👉  खटीमा में गूंजा ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का संदेश: तीन दिवसीय ‘उत्तराखंड आदि रंगोत्सव’ का भव्य आगाज

मुख्यमंत्री ने सीमांत क्षेत्रों के सामरिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ये क्षेत्र केवल राज्य की भौगोलिक सीमाएं नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सांस्कृतिक धरोहर की मजबूत कड़ी हैं। सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता सीमांत इलाकों के निवासियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है। इसके लिए इन क्षेत्रों में सड़क, दूरसंचार, स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाओं के साथ-साथ रोजगार, होम-स्टे, इको-टूरिज्म और सौर ऊर्जा से संबंधित कनेक्टिविटी को तेजी से मजबूत किया जा रहा है। उन्होंने दोहराया कि राज्य सरकार पर्वतीय सीमांत गांवों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक समान और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

यह भी पढ़ें 👉  गांधी-शास्त्री जयंती पर उत्तराखण्ड में श्रद्धा और नमन: मुख्यमंत्री आवास और सचिवालय में महापुरुषों को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि

इस ऐतिहासिक बैठक के दौरान देवभूमि की समृद्ध लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान भी देखने को मिला। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एवं मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों को चम्पावत के प्रसिद्ध देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम की ऐतिहासिक ‘बग्वाल’ परंपरा से जुड़ी पारंपरिक ढाल ‘फर्रा/छन्तोली’ भेंट की गई। रिंगाल और बांस की खपच्चियों से कलात्मक छतरीनुमा आकार में तैयार यह ढाल बग्वाल के दौरान सुरक्षा कवच के रूप में प्रयुक्त होती है। मंत्रिमंडल को यह पारंपरिक धरोहर भेंट किया जाना लोक संस्कृति, स्थानीय हस्तशिल्प और सीमांत क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक अस्मिता को सर्वोच्च सम्मान देने का प्रतीक रहा।

Ad_RCHMCT