रामनगर में राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ: उत्तराखंड के सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक वैभव और चिंतन धाराओं पर मंथन

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उत्तराखंड के सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक वैभव और चिंतन धाराओं पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
रामनगर, 10 अक्टूबर 2026। पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामनगर में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) द्वारा प्रायोजित तथा उत्तराखंड इतिहास संकलन समिति, उत्तराखंड प्रांत के तत्वावधान में तृतीय प्रांत अधिवेशन एवं दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ महाविद्यालय के मयूर सभागार में किया गया। उद्घाटन सत्र में अतिथियों के आगमन, दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना, स्वागत एवं विषय प्रवर्तन के साथ संगोष्ठी की औपचारिक शुरुआत हुई। कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. नरेश कुमार ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। 10 एवं 11 अक्टूबर को आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय “उत्तराखंड का सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक वैभव और चिंतन धाराएँ है। कार्यक्रम में इतिहास, संस्कृति, धर्म, लोकपरंपराओं और भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पक्षों पर विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. बाल मुकुंद पाण्डे, राष्ट्रीय संगठन मंत्री, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली, का स्वागत एवं बैज अलंकरण महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफे. एम.सी. पाण्डे ने किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. बहादुर सिंह बिष्ट का स्वागत एवं बैज अलंकरण प्रोफे. सी.एस. जोशी ने किया। मुख्य वक्ता प्रोफे. शंतन सिंह नेगी का स्वागत एवं बैज अलंकरण डॉ. गोकुल सिंह सत्याल ने,प्रोफे. एम.सी. पाण्डे का प्रोफे. नूतन श्रीवास्तव ने , डॉ. शरद भट्ट का प्रोफे. अनीता जोशी ने तथा डॉ. नरेश कुमार का स्वागत एवं बैज अलंकरण शकीबा जबीन सिद्दीकी ने किया। मुख्य अतिथि डॉ. बाल मुकुंद पाण्डे ने अपने संबोधन में भारतीय इतिहास को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना का महत्त्वपूर्ण आधार मानने पर बल दिया। उन्होंने उत्तराखंड की ऐतिहासिक परंपराओं, प्राचीन ज्ञान-विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों के अध्ययन को प्रासंगिक बताते हुए कहा कि इतिहास का उद्देश्य केवल अतीत की घटनाओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि उनसे वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा प्राप्त करना भी है। उन्होंने स्थानीय इतिहास, लोकस्मृतियों और ऐतिहासिक स्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता पर भी बल दिया। विशिष्ट अतिथि डॉ. बहादुर सिंह बिष्ट ने उत्तराखंड की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए हिमालय को भारतीय आध्यात्मिक चेतना का महत्त्वपूर्ण केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि प्रदेश की लोक संस्कृति, पर्व-त्योहार, लोकदेवता, तीर्थस्थल और पारंपरिक जीवन-पद्धतियाँ इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान निर्मित करती हैं। इन परंपराओं का अध्ययन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में सहायक हो सकता है। मुख्य वक्ता प्रोफे. शंतन सिंह नेगी ने उत्तराखंड के सांस्कृतिक अतीत और चिंतन धाराओं के अध्ययन में ऐतिहासिक दृष्टिकोण की महत्ता रेखांकित की। उन्होंने लोकपरंपराओं, मौखिक इतिहास, साहित्यिक स्रोतों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के समन्वित अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने इस बात को महत्त्वपूर्ण बताया कि क्षेत्रीय इतिहास का अध्ययन व्यापक भारतीय इतिहास के संदर्भ में किया जाना चाहिए, जिससे स्थानीय परंपराओं के योगदान को समुचित पहचान मिल सके। डॉ. शरद भट्ट ने उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने लोकगीतों, लोककथाओं, रीति-रिवाजों और पारंपरिक ज्ञान को सांस्कृतिक इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोतों के रूप में देखने की आवश्यकता रेखांकित की। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराने तथा उसके वैज्ञानिक और शोधपरक दस्तावेजीकरण को प्रोत्साहित करने की बात कही। कार्यक्रम संयोजक डॉ. नरेश कुमार ने इतिहास के अध्ययन में शोधपरक दृष्टिकोण, प्रमाणिक स्रोतों और अकादमिक संवाद की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र के अतीत को समझने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों का आलोचनात्मक विश्लेषण आवश्यक है। उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपराओं का व्यवस्थित अध्ययन न केवल क्षेत्रीय इतिहास को समृद्ध करेगा, बल्कि भारतीय इतिहास की विविधता और व्यापकता को समझने में भी सहायक होगा। प्राचार्य प्रोफे. एम.सी. पाण्डे ने अतिथियों एवं विद्वानों का स्वागत करते हुए कहा कि इस प्रकार की राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध, संवाद और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देती हैं। उन्होंने उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन को विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि अपनी ऐतिहासिक जड़ों को समझना सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व को मजबूत करता है। संगोष्ठी का उद्देश्य उत्तराखंड के सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक वैभव और विविध चिंतन धाराओं का अकादमिक अध्ययन करना तथा इनसे संबंधित ऐतिहासिक स्रोतों और परंपराओं के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। दो दिवसीय आयोजन में विद्वानों के व्याख्यानों और शोधपरक विचार-विमर्श के माध्यम से उत्तराखंड की सांस्कृतिक विशिष्टताओं को व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया जा रहा है। प्रथम तकनीकी सत्र में डॉ. विजय बहुगुणा ने उत्तराखंड का सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक विशिष्टता और चिंतन धाराएँ: एक ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। डॉ. अनिल शाह ने उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान, डॉ. अनीता चौहान ने पर्यटन के सामाजिक जीवन पर प्रभाव तथा डॉ. अजीत कुमार रावत ने उत्तराखंड की प्राचीन सभ्यता और इतिहास के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन पर अपने विचार रखे। इसी क्रम में डॉ. प्रशांत कुमार ने कत्यूर, चंद और पंवार राजवंशों के संदर्भ में उत्तराखंड के प्राचीन मंदिरों एवं मेलों के ऐतिहासिक कालक्रम पर चर्चा की। चारधाम यात्रा की ऐतिहासिक निरंतरता एवं उत्तराखंड में पर्यटन के विकासक्रम तथा वैश्वीकरण के योग पर प्रभाव जैसे विषय भी तकनीकी सत्र के निर्धारित शोधपत्रों में शामिल रहे। द्वितीय तकनीकी सत्र में आधुनिकता का पारंपरिक संस्कृति पर प्रभाव, उत्तराखंड की ऐतिहासिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत, मध्य हिमालय में पर्यटन एवं तीर्थाटन, लोक आस्था, पारंपरिक जीवन-पद्धति, सामाजिक आंदोलनों और लोकसंस्कृति के संरक्षण जैसे विषयों पर शोधपत्र निर्धारित किए गए। शोधपत्रों के विषयों से स्पष्ट हुआ कि संगोष्ठी में उत्तराखंड की विरासत को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में भी समझने का प्रयास किया जा रहा है। संगोष्ठी का प्रमुख उद्देश्य उत्तराखंड की प्राचीन सभ्यता, ऐतिहासिक राजवंशों, धार्मिक परंपराओं, लोकदेवताओं, लोकगीतों, मेलों, तीर्थस्थलों तथा पारंपरिक ज्ञान के विभिन्न पक्षों का शोधपरक अध्ययन करना है। इसके साथ ही पर्यटन, वैश्वीकरण और आधुनिकता के प्रभावों के बीच स्थानीय संस्कृति की पहचान बनाए रखने तथा ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की चुनौतियों पर अकादमिक संवाद को बढ़ावा देना भी आयोजन की महत्त्वपूर्ण दिशा है।दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत 11 अक्टूबर को भी निर्धारित कार्यक्रमों के अनुसार विचार-विमर्श जारी रहेगा। कार्यक्रम का संचालन डॉ अल्का द्वारा किया गया ।

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